मेरे स्नेही जन

Tuesday, December 10, 2013

सरदी आई ,सरदी आई


सरदी आई ,सरदी आई

ठंडी ने कहर बरसाई

मम्मी कहती स्वेटर पहनो

शाम से पहले घर पहुचो

कैसी मुसीबत है भाई

सरदी आई, सरदी आई

पहाडो ने फिर ओढी चादर

 बर्फ की वो झिल-मिल झालर

सर्द हवा ने ली अंगड़ाई

सरदी आई सरदी आई……

धूप थकी सी आती है 

कभी बादल में छुप जाती है 

लुक्का छुप्पी हमें न भाई

सरदी आई ,सरदी आई……

दिन छोटे और लम्बी रातें

भूल जाओ अब खेल की बातें

नही छूटती अब रजाई

सरदी आई सरदी आई……

*****

महेश्वरी कनेरी

12 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर बाल रचना...
    :-)

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  2. कल 12/12/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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    1. धन्यवाद! यश्वन्त..

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  3. सार्थक
    बहुत ही सुन्दर बाल रचना

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  4. :-) थकी सी धुप.....
    कच्ची और गुनगुनी धूप....सच्ची और चुलबुली धूप....
    प्यारी रचना...
    अनु

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  5. बहुत प्यारी बाल कविता....

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  6. Is sundar bal rachna ke liye badhaai ho aapko..
    Nav-Varsh ki shubhkamnayein..
    Please visit my Tech News Time Website, and share your views..Thank you

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  7. छोटे दिन और लम्बी रातें

    भूल जाओ अब खेल की बातें sahi bat ....samay kaise bit jata hai pata hi nahi chalta ..sundar balgeet ....

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  8. आप की बाल कविता मन को भाती है।

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  9. आपकी कविता बहुत ही सुन्दर हैँ।
    आपना ब्लॉगसफर आपका ब्लॉग ऍग्रीगेटरपर लगाया गया हैँ । यहाँ पधारै
    आपके ब्लॉग की यह कविता मुझे बहुत ही पसँद आयी आगर आपकी स्वीकृति हो तो आपकी यह रचना अपना ब्लॉगRSD Web mideyaपर प्रकाशित कर सकते हैँ। अपना जवाब जरूर देँ1
    धन्यवाद

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  10. अच्छी कविता है. बालमन को भाने वाली

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